अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच चल रही लड़ाई अब पूरी तरह बदल चुकी है। 28 फरवरी 2026 को जो जंग ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाकर शुरू हुई थी, वह चार महीने में होर्मुज स्ट्रेट पर आकर टिक गई है। ट्रंप का पूरा फोकस अब न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स छोड़कर इस संकरे समुद्री रास्ते पर शिफ्ट हो चुका है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ‘एपिक फ्यूरी’ नाम से बड़ा ऑपरेशन चलाया। ईरान के परमाणु ठिकानों, मिसाइल साइट्स, कमांड सेंटर और सैन्य अड्डों पर एक साथ हमले हुए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। यह ईरानी शासन के लिए बहुत बड़ा झटका था। ट्रंप प्रशासन का कहना था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है, जिसे रोकना जरूरी है।
इससे पहले 2025 से बातचीत चल रही थी लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन्स से जवाबी हमले किए। इजरायल, अमेरिकी बेस और खाड़ी देशों को निशाना बनाया गया। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। दुनिया का 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने जहाजों पर हमले शुरू किए तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। इस तरह जो लड़ाई परमाणु डील और हथियार रोकने पर शुरू हुई थी, वह तेजी से होर्मुज और तेल मार्ग की लड़ाई में बदल गई।
मार्च 2026 में ईरान ने होर्मुज को पूरी तरह ‘बंद’ घोषित कर दिया। कई जहाजों पर हमले हुए, शिपिंग लगभग रुक गई। अमेरिका ने ईरानी नौसेना के कई जहाज नष्ट किए लेकिन ईरान ने माइन्स और फास्ट अटैक बोट्स से जवाब दिया। तेल की कमी एशिया में महसूस होने लगी। अप्रैल की शुरुआत में पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से 7-8 अप्रैल को दो हफ्ते का सीजफायर हुआ। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। लेकिन होर्मुज का मुद्दा अनसुलझा रहा। ईरान ने होर्मुज पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ा।
11-12 अप्रैल को इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत हुई। 1979 के बाद यह सबसे ऊंचे स्तर की बातचीत थी। फिर भी कोई समझौता नहीं हुआ। इसके बाद ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना को होर्मुज पर ब्लॉकेड लगाने का आदेश दिया। ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों को रोका गया। यह ‘ड्यूल ब्लॉकेड’ की स्थिति बन गई। ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा क्योंकि उसका तेल निर्यात बंद हो गया। लेबनान में हिजबुल्लाह-इजरायल लड़ाई भी दोबारा शुरू हो गई। युद्ध अब परमाणु से ज्यादा आर्थिक और नौसैनिक नियंत्रण की लड़ाई बन चुका था।
मई में लड़ाई जारी रही लेकिन बातचीत भी चलती रही। जून में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मध्यस्थता से बड़ा ब्रेकथ्रू आया। 14 जून को इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) की घोषणा हुई। 17 जून को ट्रंप ने फ्रांस में और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस पर दस्तखत किए। समझौते में मुख्य बातें थीं – होर्मुज को फिर से खोलना, अमेरिकी ब्लॉकेड हटाना, लेबनान में लड़ाई रोकना, ईरान पर प्रतिबंधों में कुछ राहत और पुनर्निर्माण मदद। परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिनों में आगे बातचीत तय हुई। होर्मुज पर ईरान का ‘टोल-फ्री’ नियंत्रण खत्म करने का वादा हुआ। जहाजों की आवाजाही फिर शुरू हुई लेकिन पूरी तरह सामान्य नहीं हुई। परमाणु मुद्दा टाल दिया गया, जिससे साफ हो गया कि युद्ध अब होर्मुज पर केंद्रित है।
जून के MoU के बाद भी तनाव कम नहीं हुआ। जुलाई की शुरुआत में ईरान ने होर्मुज में फिर जहाजों पर हमले किए। 6-7 जुलाई को तीन जहाज निशाना बने। ट्रंप ने इसे MoU का उल्लंघन बताया और कहा कि समझौता ‘ओवर’ है। अमेरिका ने जवाबी हमले किए – ईरानी रडार, एंटी-शिप मिसाइल साइट्स, कमांड सेंटर्स और IRGC की छोटी नावों पर। CENTCOM ने कहा कि ये हमले होर्मुज में नेविगेशन की आजादी सुनिश्चित करने के लिए हैं। ईरान ने भी बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। ट्रंप ने तेल निर्यात पर सैंक्शंस वेवर वापस ले लिया। तेल की कीमतें फिर बढ़ीं। 8 जुलाई तक स्थिति तनावपूर्ण है लेकिन पूर्ण युद्ध की ओर नहीं बढ़ी।
शिफ्ट क्यों हुआ? ट्रंप की रणनीति शुरू में परमाणु खतरे को खत्म करने की थी। खामेनेई की मौत और साइट्स पर हमले इसका सबूत हैं। लेकिन ईरान ने होर्मुज को हथियार बना लिया, जो दुनिया के तेल व्यापार का चोकपॉइंट है। इससे युद्ध आर्थिक मोर्चे पर चला गया। अमेरिका को खाड़ी देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाना पड़ा। होर्मुज पर ब्लॉकेड और काउंटर-ब्लॉकेड से ईरान की कमजोरी सामने आई क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है। MoU में परमाणु को टालकर ट्रंप ने होर्मुज को प्राथमिकता दी। यह शिफ्ट दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में आर्थिक चोकपॉइंट्स कितने शक्तिशाली हो सकते हैं।
28 फरवरी से अब जुलाई 2026 तक ट्रंप की ईरान लड़ाई परमाणु से होर्मुज पर पूरी तरह शिफ्ट हो चुकी है। हजारों मौतें, लाखों विस्थापित और वैश्विक तेल संकट इसके नतीजे हैं। MoU ने अस्थायी राहत दी लेकिन जुलाई का टकराव दिखाता है कि शांति अभी दूर है। परमाणु मुद्दा बाकी है, लेकिन होर्मुज अब मुख्य मैदान बन गया है।
