दिल्ली में स्लीपर बस की सुरक्षा जांच: 5 में से कोई भी नियम नहीं मान रहीं बसें, नाबालिग गैंगरेप केस ने खोली पोल
दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली स्लीपर बसों में सुरक्षा का कोई ठिकाना नहीं है। हाल ही में एक चलती बस में नाबालिग के साथ हुई दर्दनाक घटना ने इसकी पोल खोलकर रख दी है। आज तक ने जब बसों की जमीनी हकीकत जानने के लिए रियलिटी चेक किया, तो पाया कि पांच में से कोई भी सुरक्षा नियम पूरा नहीं हो रहा।
जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। बस में न तो सीसीटीवी कैमरे थे, न ही एसओएस बटन। ड्राइवर और यात्रियों के बीच बड़ी दीवार जैसी पार्टिशन लगी थी। आपातकालीन निकास के लिए चार दरवाजे होने चाहिए, लेकिन वहां सिर्फ दो खिड़कियां ही मिलीं।
ग्रेटर नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट तक चलने वाली बस में 4 अगस्त को यह शर्मनाक वारदात हुई। आरोप है कि नाबालिग के साथ डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक दरिंदगी होती रही। पीड़िता उत्तर प्रदेश के मैनपुरी से आई थी। वह नोएडा में रहने वाले अपने रिश्तेदार के पास जा रही थी।
परी चौक पर उतरने के बाद बस का कंडक्टर उसे छेड़ने लगा। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी गई। इसके बाद बस में मौजूद संदीप और कुलदीप नाम के आरोपियों ने उसके साथ गैंगरेप किया। पूरे रास्ते में 47 किलोमीटर तक किसी ने बस को रोककर जांचा तक नहीं।
2012 के निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा के कई नियम बनाए गए थे। लेकिन 14 साल बाद फिर वही हालात नजर आ रहे हैं। बस ड्राइवर ने बताया कि पुलिस सीसीटीवी और एसओएस बटन की जांच नहीं करती। उसका आरोप है कि पुलिस सिर्फ पैसे लेने के लिए बसों को रोकती है।
नियमों के मुताबिक ड्राइवर और यात्रियों के बीच कोई पार्टिशन नहीं होना चाहिए, ताकि अंदर की गतिविधियां दिखती रहें। बस में कम से कम तीन सीसीटीवी कैमरे लगने चाहिए। यात्रियों के पास एसओएस बटन होना जरूरी है। आपातकाल के लिए चार एग्जिट गेट होने चाहिए और रात में पर्दे खुले रखने का नियम है।
लेकिन रियलिटी चेक में यह सब गायब मिला। सवाल यह है कि नियम बनाने से क्या फायदा, जब उनका कोई पालन ही न हो। पीड़िता ने हिम्मत दिखाकर कश्मीरी गेट थाने में शिकायत की। पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन सवाल बाकी है। क्या ऐसी घटनाएं तब तक नहीं रुकेंगी, जब तक सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन नहीं होगा।
