सपा चीफ अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण व परिसीमन बिल के समर्थन के संकेत दिए, तीन महीने में यू-टर्न करा देश

राहुल शर्मा
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल के समर्थन के संकेत दिए हैं। उन्होंने यह संकेत महिला संगठनों से मुलाकात के बाद तीन महीने में अपने पिछले रुख से यू-टर्न लेते हुए दिया है।

अखिलेश ने कहा कि महिला आरक्षण बिल्क उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव से ही लागू किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने परिसीमन बिल के जरकर दिया है।

अप्रैल 2026 में अखिलेश ने इन दोनों बिलों का विरोध किया था और मोदी सरकार को parlament में पास नहीं होने दिया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना दोस्त बताया था, लेकिन सपा सांसदों ने बिलों के खिलाफ वोट किया था।

तीन महीने बाद मॉनसून सत्र में मोदी सरकार फिर से ये बिल लाने की तैयारी में है। इसी बीच अखिलेश ने महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। बैठक के बाद उन्होंने तीन शर्तों के साथ समर्थन का संकेत दिया है।

पहली शर्त यह है कि महिला आरक्षण को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही लागू किया जाए। दूसरी शर्त परिसीमन बिल के माध्यम से उच्च सदन, यानी विधान परिषद और राज्यसभा में सीटों की संख्या बढ़ाई जाए। तीसरी शर्त महिला आरक्षण बिल में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं, खासकर अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।

अखिलेश ने कहा कि ये मांगें पूरी होने पर सपा सरकार को समर्थन दे सकती है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भी इसी बात को दोहराया और कहा कि महिला आरक्षण केवल लोकसभा तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश का यह कदम यू-टर्न नहीं बल्कि रणनीतिक बदलाव है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में घटनाक्रम के बाद वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। बीजेपी नीत एनडीए दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच रही है, ऐसे में विरोध करना उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

अखिलेश ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य महिला आरक्षण को प्रभावी बनाना और अपने सामाजिक गठबंधन पीडीए का एजेंडा आगे बढ़ाना है। वे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के प्रतिनिधित्व को मजबूत करना चाहते हैं।

इस विकास के साथ उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीति नए मोड़ पर आ गई है। महिला आरक्षण बिल अब न सिर्फ सामाजिक मुद्दा बल्कि चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

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