अमेरिका के सीनेट ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने वाले बिल को बहुमत से मंजूरी दे दी है। इसने डोनाल्ड ट्रंप के प्रधानमंत्रीयालय को सीधे सवाल उठाए हैं। भारत-चीन जैसे रूस से तेल आयात करने वाले देश पर पूरी तरह से असर पड़ेगा। सीनेटर ने कहा, “जब हम भारत का समर्थन करके चीन के साथ मेल मिलाकर प्रतिस्पर्धा को समझ रहे हैं, तो 100 फीसदी टैरिफ लगाना आत्मघाती कदम है।” यह फैसला गहरी चर्चा का बिंदु बन गया है।
वॉशिंगटन में आज इस बात की पुष्टि हो गई है कि रूस के पेट्रोलियम उत्पादों के मुख्य खरीदारों पर तीव्र व्यापार प्रतिबंध लागू करने का इरादा है। इस बिल के तहत, अमेरिका की सरकार भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देशों को दो-तीन साल में रूसी तेल के आयात पर 100 फीसदी टैरिफ लगा सकेगी। यह उठाया गया एकजुट कदम उत्तर युक्रेन युद्ध के समर्थन के लिए लगाया गया है।
हालांकि, इस फैसले के बाद अमेरिका में उतारत्मक प्रतिकार शुरू हो गया है। एक पूर्व सीनेटर ने कहा, “भारत के खिलाफ ऐसे कदम उठाना न केवल व्यापारिक संबंधों को नष्ट करेगा, बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी परेशान करेगा।” इस बिल के पीछे राजनीतिक तथ्य बदलेगा और ट्रंप के समय के विपरीत रुझानों का समर्थन करने वाले धमाकेदार निर्णय से भी अलग है।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर पहिले भी ट्रंप प्रशासन ने कड़ी नियमन शासन शासन का कदम उठाया था। लेकिन इस मामले में सरकार के फैसले का संदेह उठाया जा रहा है। साथ ही, इस बिल के तहत सीनेट ने ‘ईरान सैंक्शन एक्ट ऑफ 1996’ की समय सीमा को 2031 तक बढ़ा दी है। इससे ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर निर्णायक सजा लग सकेगी।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाने वाले इस बिल के संगठनात्मक पर स्तंभन होगा। समयबंद चर्चा के बाद यह ट्रंप के समय के फैसलों से अलग हो सकता है। इस बिल के समर्थक इसे ‘चीन के खिलाफ एक बड़ा संदेश’ के रूप में पेश कर रहे हैं। जबकि विरोधी इसे ‘देशों की आर्थिक नीतियों को प्रतिबंधित करने की कोशिश’ कह रहे हैं।
