मिर्जापुर की दुनिया आठ साल बाद बड़े पर्दे पर छाई है। मिर्जापुर द मूवी रिव्यू में बात करें तो ये फिल्म उसी भौकाल को दोहराने का वादा कर रही है जो वेब सीरीज ने किया था। पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु शर्मा और रवि किशन जैसे बड़े नाम इस फिल्म में मौजूद हैं। डायरेक्टर गुरमीत सिंह ने इस बार भी अपनी फिल्म को लेकर नई दिशा दी है। आइए, जानते हैं कि ये फिल्म असली में क्या लेकर आई है।
फिल्म की कहानी सीजन 1 के बीच से शुरू होती है। मिर्जापुर के किंग कालीन भैया, जिन्हें पंकज त्रिपाठी ने निभाया है, अपनी गद्दी पर बैठे पूरे पूर्वांचल पर राज कर रहे हैं। उनके दो हाथ गुड्डू पंडित और बबलू पंडित हैं। गुड्डू पंडित का रोल अली फजल ने और बबलू पंडित का रोल जितेंद्र कुमार ने निभाया है। कालीन भैया का बेटा मुन्ना भइया, जिसे दिव्येंदु शर्मा ने खेला है, भी अपना पावर दिखाने से पीछे नहीं हटता।
इस दुनिया में अभी भी कट्टा और बर्फी का व्यापार जोर-शोर से चल रहा है। मगर फिर एक नई खतरे की आवाज़ गूंजती है। जैसलमेर का बाहुबली बब्बन यादव, जिसका किरदार रवि किशन ने निभाया है, मिर्जापुर की गद्दी पर अपनी नज़र रख रहा है। उसकी मंशा है कालीन भैया को खत्म करना और खुद किंग बनना। बब्बन यादव के साथ रति शंकर शुक्ला और जेपी यादव भी हैं। गुड्डू-बबलू और मुन्ना भइया जैसे तीन तगड़े पहलवान उनके सामने खड़े हैं।
फिल्म की कहानी बनाने की कोशिश की गई है कि उन्हें जो मिर्जापुर सीरीज देखे हैं, उन्हें आसानी से समझ आए। लेकिन पहली बार यहीं दुनिया आने वालों के लिए भी सब कुछ समझाया गया है। डायरेक्टर गुरमीत सिंह ने हर मोमेंट को इतने अच्छे से ढांचा दिया है कि बीच में एक भी पल बेकार नहीं लगता। कुछ नए किरदार भी शामिल किए गए हैं जो अपना काम बेहतरीन तरीके से करते हैं।
अब चलिए बात करते हैं उन सीटीमार मोमेंट्स की जो मिर्जापुर द मूवी में भरमार हैं। फिल्म में हर कुछ मिनट में कोई न कोई एक्शन या ड्रामेटिक मोमेंट मिलता है। गुड्डू पंडित की गैंगस्टर गिरी हो, मुन्ना भइया का अंदाज बदले, या फिर बब्बन यादव की एंट्री हो — हर सीन में तालियाँ बजने को मिलती हैं। गानों की बात करें तो ये फिल्म उन धुनों को लेकर आई है जो आपने रील्स पर या ऑडियो पर पहले से सुनी होंगी। जब वो गाने स्क्रीन पर बजते हैं, तो एक्साइटमेंट अपने आप बढ़ जाती है।
रवि किशन की एंट्री सचमुच दमदार है। उन्होंने बब्बन यादव के रोल में पूरी एक्टिंग रेंज दिखाई है। लंबे समय बाद उन्हें एक मजबूत रोल में देखने को मिला है जहाँ वो पूरी तरह से छाए हुए हैं। उनका वजनदार प्रदर्शन मिर्जापुर की दुनिया में नई जान सी फूंक देता है। अली फजल और दिव्येंदु शर्मा भी अपने-अपने किरदारों में बढ़िया निखरे हुए हैं। गुड्डू पंडित और मुन्ना भइया के रोल में दोनों ने समा बांध दी।
पंकज त्रिपाठी ने भी अपना दबदबा बनाए रखा है। वो जब भी स्क्रीन पर आए, ऐसा लगता है कि वही असली राजा हैं। जितेंद्र कुमार की बालिए तो थोड़ी अलग है। बबलू पंडित के रोल में उन्होंने मेहनत की, लेकिन स्क्रीन पर वो उतनी ताकत दिखाई नहीं देती जैसी फैंस चाहते हैं। सच कहूं तो बबलू पंडित के रोल में विक्रांत मैसी को और याद किया जाता था।
सपोर्टिंग कास्ट की तो बात करें तो रसिका दुग्गल, शीबा चड्ढा, सोनल चौहान, मोहित मलिक, अभिषेक बनर्जी, श्वेता त्रिपाठी और श्रिया पिलगांवकर — इन सबकों ने अपने रोल को पूरी शिद्दत से निभाया है। उनकी मौजूदगी से फिल्म और भी मजबूत लगती है। गुड्डू-मुन्ना के बीच वो 36 का आंकड़ा भी देखने में मजेदार लगा। हर किरदार अपने अंदाज में निखरकर सामने आता है।
मिर्जापुर द मूवी एक मसाला और लार्जन-देन लाइफ फिल्म है। यदि आप मसालेदार एक्शन और पावरफुल एक्टिंग पसंद करते हैं, तो ये फिल्म आपके लिए बढ़िया अनुभव हो सकती है। एक बात ध्यान रखें — इसे फैमिली के साथ ना देखें। बच्चों को मिर्जापुर की दुनिया से दूर रखना बेहतर रहेगा। कहानी, एक्शन और एक्टिंग — सब कुछ मिला है इस फिल्म में। अब शेष यही बतेगा कि आप इसे कैसे महसूस करते हैं।
