NEET बवाल से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक: कॉकरोचों ने बदल दिया संघर्ष का खेल
NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री इस्तीफा – पिछले कुछ महीनों से भारत की राजनीति में नीट विवाद सबसे बड़ा मुद्दा बनकर रहा है। 3 मई को जब देशभर में NEET UG परीक्षा हुई थी, तब से ही यह कहानी शुरू हुई थी। करीब 22 से 24 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया था इस परीक्षा में, कुछ दिन बाद ही शिकायतें सामने आईं कि मॉडल पेपर के ज़रिए असली सवाल ग़ैर-क़ैनूनी रूप से लीक हो चुके थे।
इसके बाद हड़कंप मच गया। 12 मई को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने दिलचस्पी के साथ पूरी परीक्षा को रद्द कर दिया। साथ ही सीबीआई ने भी जांच शुरू कर दी। फिर 21 जून को दोबारा NEET की परीक्षा कराई गई और परिणाम भी जल्दी सार्वजनिक हुए, परंतु लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ।
इसी दौरान 15 मई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक प्रेस ब्रीफिंग में स्वीकार किया कि पेपर लीक हुआ आसली। उन्होंने कहा कि यह गड़बड़ी कमांड चेन में एक गलती की वजह से हुई। दीर्घा याद रहे कि धर्मेंद्र प्रधान का यह इस्तीफा सिर्फ इस्तीफा नहीं, बल्कि पूरे NEET बवाल का परिणाम था जो मई से जुलाई तक देश को हिला रहा था।
नींबू से पकौड़ा बनने को 20 दिन
लेकिन सबसे अजीब घटना तब सामने आई जब 16 मई को अभिजीत दिपके ने मजाकिया अंदाज़ में सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी की घोषणा की। शुरू में लोगों ने इसे मज़ाक समझा था, पर हफ्तों के अंदर यह संगठन लाखों सपोर्टर्स तक पहुँच गया। जैसे ही NEET परीक्षा रद्द हुई, यही मजाकिया मंच युवाओं के गुस्से को जाहिर करने का सबसे बड़ा ज़रिया बन गया।
6 जून को सीजेपी ने अपना पहला बड़ा प्रदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर पर किया। उनकी तीन मुख्य मांगें थीं – शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव, और आत्महत्या कर चुके छात्रों के परिवारों को मुआवज़ा। देश के हर कोने में युवा शामिल होने लगे थे।
जून के अंत तक आंदोलन और तेज़ हो गया। प्रदर्शनकारियों ने जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया, और लगे कि जब तक धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक वहाँ से नहीं हटेंगे। इसी दौरान प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल पर बैठकर करीब 26 दिन तक अपना विरोध जताया, जिसने इस मुद्दे को और गरमाया।
एक महीने बाद संसद का भी जमावड़ा पूरी तरह ठप पड़ा। मानसून सत्र शुरू हुआ लेकिन नीट मुद्दे ने हर बात को अपनी ओर मोड़ लिया। विपक्षी सांसद रोज़ सदन के वेल में जाकर नारेबाज़ी कर रहे थे और ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ के नारे लगा रहे थे। इससे लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्यवाही कई दिनों के लिए स्थगित करनी पड़ी।
20 जुलाई को सबसे तनावपूर्ण दिनों में से एक रहा। सीजेपी ने ‘चलो संसद’ नाम से एक बड़े मार्च की योजना बनाई। पुलिस ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी फिर भी हज़ारों प्रदर्शनकारी संसद की तरफ बढ़े। इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें कई लोग घायल हो गए।
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उसी दिन विपक्ष भी सड़क पर उतर आया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री के आवास लोक कल्याण मार्ग की तरफ जुलूस किया और पुलिस ने इन्हें हिरासत में ले लिया। विपक्ष ने तीन मुख्य मांगें रखीं – शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई की जांच, और छात्रों से सार्वजनिक माफ़ी मांगना।
सरकार बार-बार कह रही थी कि वह इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष का जवाब साफ था – पहले मंत्री इस्तीफा दें, फिर ही बातचीत की बात आएगी।
23 और 24 जुलाई के दो दिन PM मोदी ने खुद वीडियो संदेश जारी किए। 23 को उन्होंने कहा था कि पेपर लीक करने वालों के खिलाफ और भी सख्त कार्रवाई होगी, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे, और सख्त सजा का प्रावधान रखने वाला नया बिल कैबिनेट को मंजूरी में लाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों का भविष्य सबसे ज़रूरी है और कई दोषी पहले से ही जेल में हैं।
फिर 24 जुलाई को केंद्रीय कैबिनेट ने पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून वाला ड्राफ्ट बिल मंजूरी दे दिया, जिसमें फास्ट ट्रैक कोर्ट और कठोर सज़ा का प्रावधान शामिल है। इसी दिन सीजेपी के प्रतिनिधि सौरव दास और आशुतोष रंका केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह से मिले।
इस मुलाक़ात में सीजेपी ने अपनी तीन मांगें दोहराईं – धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, आत्महत्या कर चुके छात्रों के परिवारों को एक करोड़ रुपये मुआवज़ा, और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज केस वापस लेना। सरकार ने मुआवज़ा और केस वापस लेने पर सैद्धांतिक सहमति जताई, लेकिन इस्तीफे के मुद्दे पर थोड़ा देर बोली। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की देरभर सरकारी सूत्रों ने इस बात को मना भी किया कि उनका इस्तीफा एजेंडे में नहीं है।
सरकार ने कहा था कि उनका पूरा ध्यान परीक्षा सुधार, सुरक्षित प्रणाली और कड़े क़ानून बनाने पर है।
फिर आया तय करने वाला घंटा
25 जुलाई शनिवार को दिल्ली के मौसम में क़द्र दो बजे थे जब एक बड़ी ख़बर सुनाई दी – धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय शिक्षा मंत्री, ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने PM मोदी को एक चिट्ठी भेजी थी, जिसमें लिखा था कि ‘पिछले 10 दिनों का घटनाक्रम देखकर मन दुखी है’। साथ ही उन्होंने कहा था कि उनके लिए ‘वो कठिनाइयाँ ज़रूरी थीं जो युवाओं के लिए थीं’।
इस्तीफे की ख़बर आने पर जंतर मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने इसे जीत मानी। लेकिन सीजेपी का कहना है कि जब तक सब मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होगा। इन मांगों में परीक्षा प्रणाली में ज़ोरदार सुधार, NEET उम्मीदवारों के लिए फ़ेयर अवसर, और पीड़ित परिवारों के साथ न्याय भी शामिल है।
अब सरकार और सीजेपी के बीच बातचीत का अगला दौर शुरू हो सकता है। संसद में भी गतिरोध बना हुआ है। देश भर में युवाओं के बीच अब सवाल यही है कि क्या इस इस्तीफे से NEET विवाद पर असली बदलाव आएगा, या फिर यह सिर्फ एक राज़नीतिक मोड़ साबित होगा।
