दिल्ली दंगों के 2020 केस में अब तक आठ साल बीत चुके हैं, लेकिन अंकित शर्मा के परिवार के दिल के दर्द की धड़कन अभी भी वही है। चश्मदीदों ने बताया था कि IB अधिकारी अंकित शर्मा को खींचकर ताहिर हुसैन के कैंप ऑफिस में ले जाया गया था। लेकिन आज भी वह घर, जहां अंकित के साथ ये घटना घटी थी, एक अधूरे सवाल के साथ है।
कोर्ट ने ताहिर हुैन और पांच अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन अंकित के भाई अंकुर शर्मा का यह फैसला जीत का नहीं, अधूरे न्याय का एहसास दिलाया। ‘मैं इस फैसले से न नाराज हूँ, न खुश,’ कहते अंकुर। ‘मेरे भाई के साथ इतनी क्रूरता की गई गुनहगारों के हाथ नहीं छूड़े गए। उन्हें अज्ञात खून के बदले मिलना चाहिए।’
25 फरवरी 2020 की उस रात अंकित शर्मा की आखिरी बातचीत इतनी साधारण थी। वह IB हेडक्वार्टर से चलेकर अपने घर लौट रहे थे। घर पर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘बेटा तू ठीक है ना?’ अंकित ने जवाब दिया, ‘दफ्तर से फोन है, बाहर जाकर देखो कि आस-पड़ोस में क्या हो रहा है।’ ये शब्द कभी वापस न लौटे।
रात बीत गई, अंकित कोई नहीं मिला। परिवार ने सोचा, शायद वह किसी दोस्त के पास चले गए या किसी काम में फंस गए। पर जब सभी परिचितों से पूछा, तो कोई जानकारी नहीं मिली। दयालपुर थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई गई। रात के करीब ढेर बजे वापस आए परिवार ने आशा नहीं त्यागी। पड़ोसियों के साथ मिलकर एक बार फिर घर के चारों ओर खोज हाई थी।
लेकिन जो बात पता चली, उसने सबको हिला दी। ताहिर हुसैन के घर से उपद्रवी हमला कर रहे थेलोगों ने कहा था कि अंकित को खींचकर उसके कैंप ऑफिस में ले जाया गया था। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि ताहिर और उसके साथिययों ने अंकित समेत तीन लोगों की हत्या कर दी थी। फिर उन शवों को नाले में फेंक दिया गया था।
26 फरवरी की सुबह पुलिस ने अंकित का क्षत-विक्षत शव बरामद कराया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में झलकी घावों की संख्या 51 थीं। अंकुर कहते हैं, ‘हर बार रिपोर्ट देखते ही पूछता हूँ कि इंसान के साथ इतनी क्रूरता कैसे की जा सकती है।’
हत्याकांड के बाद पुलिस ने परिवार को सुरक्षा दी, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। भाई के बिना घर हर दिन एक नई सजा जैसा लगता था। अंकित के घर से महज 200 मीटर दूर वही नाला है, जिसमें उसका शव मिला था। अंकुर कहते हैं, ‘जब भी उनके पास से गुजरना पड़ता, लगता था जैसे कलेजा मुंह को आ जाएगा। हमने उस घर को छोड़ना ही बेहतर समझा।’
अब वे एक ऐसी जगह पर रहते हैं, जहां पड़ोसियों को नहीं पता कि वे किस घर में रहते हैं। लेकिन यादें अभी भी वही हैं। अंकुर कहते हैं, ‘मां-पापा आज भी अक्सर बीमार रहते हैं। हर दिन अंकित याद आता है। हमने घर बदल लिया, शहर का हिस्सा छोड़ दिया, लेकिन आंसू आज तक नहीं रुके।’
दिल्ली सरकार ने दस लाख रुपये का मुआवजा और शहीद का दर्जा दिया। केंद्र ने भी मदद की घोषणा की। लेकिन अंकुर कहते हैं, ‘सम्मान अपनी जगह है, लेकिन बेटे को खोने वाले परिवार की भरपाई न तो कोई मुआवजा कर सकता है, न किसी सड़क का नाम।’
अब वह अपने हाईकोर्ट में अपील दायर करने की तैयारी में हैं। ‘जब तक न्याय नहीं मिलेगा, जब तक सारे दोषीयों को फांसी नहीं मिलेगी, तब तक ये वक्त आराम से नहीं बितेगा,’ कहते अंकुर। अंकित का एक झूला भी अभी भी झूलता है, जिसके नीचे वही नाला है, जिसने उनके सपनों को भी समाप्त कर दिया।
