विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारतीय कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए नियम लागू किए हैं। लेकिन एक सवाल तुरंत उठ खड़ा हुआ: जब देश में पहले से ही सख्त कानून मौजूद हैं, तो फिर यूजीसी के इन नए विनियमों की क्या जरूरत है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15 और 17 जाति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है। एससी/एसटी एक्ट जैसे कानून और सर्वोच्च न्यायालय के पिछले फैसले भी इस दिशा में सुरक्षा कवच देते हैं। फिर भी यूजीसी के नए यूजीसी जाति भेदभाव नियमों को लेकर बहस तेज हो गई है।
इन नियमों के तहत अब हर यूनिवर्सिटी को वर्ष भर काम करने वाली ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा। समयबद्ध तरीके से शिकायतों की जांच करने और सज़ा देने का प्रावधान है। नियम तोड़ने वाली संस्थाओं को मान्यता रद्द होने या फंडिंग बंद होने का खतरा होगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यूजीसी जाति भेदभाव नियमों में नई बात सज़ा के प्रावधान हैं। वरिष्ठ वकील आस्था अनूप चतुर्वेदी कहती हैं, “मौजूदा कानून पहले से मजबूत हैं। नए नियम इन्हीं को लागू करने पर जोर देते हैं। लेकिन सज़ा का हथियार संस्थानों को डिफेंसिव मोड में ला सकता है।”
आलोचकों का कहना है कि नए नियमों में सबूतों के मानक या अपील का सिस्टम स्पष्ट नहीं है। झूठी शिकायतों से बचाने का कोई तंत्र भी नहीं बताया गया। इन खामियों से कैंपस में विवाद बढ़ने का डर जताया जा रहा है।
सवाल यह भी है कि जब अदालतें पहले ही ‘शून्य सहिष्णुता’ के साथ-साथ निष्पक्ष जांच पर जोर दे चुकी हैं तो यूजीसी को नए नियम लाने की क्या जरूरत थी? विशेषज्ञ मानते हैं कि भेदभाव की घटनाएं रुकीं नहीं हैं, इसलिए चर्चा जरूरी है। लेकिन कानूनी ढांचे को दोहराने के बजाय उसे मजबूत करने पर जोर होना चाहिए।
इस बहस का सबसे बड़ा पहलू यह है कि नए यूजीसी जाति भेदभाव नियम क्या वाकई भेदभाव को रोक पाएंगे, या फिर कानूनी उलझनों को ही बढ़ाएंगे। जब तक आयोग मौजूदा कानूनों को नाकाफी बताने वाला सफाई नहीं देता, यह विवाद थमता नहीं दिख रहा।
