सीमित शक्तियां: क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य आयुक्तों की असहमति को खारिज कर सकते हैं? जानें संविधान की बात

राहुल शर्मा
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चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार मतभेद हुए हैं। इन विवादों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), वोटर डेटाबेस और फॉर्म-6 में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह बहस उठाती है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) अपने साथी आयुक्तों की असहमति को खारिज कर सकते हैं या फिर तीन सदस्यीय आयोग में बहुमत का फैसला ही अंतिम माना जाएगा?

भारतीय संविधान की बात करें तो अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग की नींव रखता है। इसके मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष (चेयरमैन) होते हैं, लेकिन संविधान यह नहीं कहता कि हर मामले में उनकी राय अंतिम होगी। यह साफ़ करता है कि सीईसी ‘वन मैन अथॉरिटी’ नहीं, बल्कि ‘बराबरों में पहला’ (फर्स्ट अमॉन्ग इक्वल्स) हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में इस सवाल को स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा कि जब चुनाव आयोग बहुसदस्यीय होता है, तो सभी सदस्य आयोग का हिस्सा हैं और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अपनी राय रखने का अधिकार है। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर सीईसी की बात को हमेशा अंतिम माना जाए, तो दूसरे आयुक्त सिर्फ ‘सलाहकार’ बनकर रह जाएंगे। कोर्ट ने कहा, “If the CEC is considered to be superior in the sense that his word is final, he would render the ECs non-functional or ornamental.”

कानूनी ढाँचा बनाने वाला मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 कहता है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए। अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो जाए, तो मामला बहुमत की राय के आधार पर तय होगा। यानी तीन सदस्यीय आयोग में अगर दो सदस्य एक राय पर हैं, तो उनकी राय अंतिम होगी, भले ही सीईसी उससे अलग हों।

चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में कहा है कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना सामान्य बात है। आयोग ने कहा कि पिछले 10 महीनों में हुए मतभेदों को लेकर सिर्फ एक पहलू को उजागर किया गया है, जबकि बड़ी संख्या में सर्वसम्मत निर्णय लिए गए हैं। आयोग ने बताया कि हाल के महीनों में उसने कई निर्णय लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं और लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं, जो सभी पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का नतीजा हैं।

संविधान सीईसी को विशेष सुरक्षा देता है, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है, लेकिन फैसला लेने में उसे कोई विशेष वीटो पावर नहीं देता। तीन सदस्यीय आयोग की व्यवस्था का मकसद ही सामूहिक निर्णय और संतुलन बनाए रखना है। असहमति आयोग की कार्यप्रणाली का हिस्सा है, और अंतिम फैसला बहुमत से होता है।

यह मामला सिर्फ चुनाव आयोग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं में संतुलन और जाँच-प्रणाली के महत्व को भी रेखांकित करता है। चाहे सीईसी कितना भी अहम पद क्यों न हो, संविधान और कानून साफ़ करते हैं कि निर्णय सामूहिक होंगे, और मतभेद की स्थिति में बहुमत का फैसला सर्वोच्च होगा।

अब जब मतभेदों की चर्चा जोरों पर है, तो मतदाताओं और नागरिकों को यह समझना चाहिए कि चुनाव आयोग की शक्ति संतुलित है। सीईसी अध्यक्ष हैं, लेकिन वे अकेले निर्णायक नहीं हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति या पद व्यवस्थित रूप से शक्ति का दुरुपयोग न कर सके।

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