सऊदी अरब के पास क्षेत्र में सबसे बड़ा और आधुनिक हथियारों का जखीरा है। अरबों डॉलर खर्च कर अमेरिकी, यूरोपीय और चीनी हथियार खरीदे गए हैं। फिर भी रियाद हूतियों पर पूरी ताकत से हमला करने से बच रहा है। सऊदी अरब हूती संघर्ष रणनीति के तहत यह संयम बरत रहा है, क्योंकि हथियारों की कमी नहीं, बल्कि रणनीतिक मजबूरी है।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस नीति को ‘प्रबंधित प्रतिरोध’ कह रहे हैं। हूतिया विद्रोही ईरान समर्थित हैं और यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा किए हुए हैं। अगर सऊदी सीधा हमला बोले तो ईरान इसे अपने खिलाफ खुला संघर्ष मान सकता है। तेहरान पहले ही जॉर्डन, कतर और सऊदी ठिकानों पर हमले कर चुका है। इससे पूरे मध्य पूर्व में युद्ध की आग भड़कने का खतरा है।
पड़ोसी इस्लामिक देशों के साथ संबंध भी सऊदी की मजबूरी बनाए हुए हैं। खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य अपने हितों के अनुसार व्यवहार करते हैं। यूएई ने यमन में सक्रियता छोड़ दी, जबकि ओमन हमेशा मध्यस्थता करता रहा है। अगर सऊदी खुला युद्ध छेड़ता है तो ये देश समर्थन से पीछे हट सकते हैं या चुपचाप असहमति जता सकते हैं। इससे मुस्लिम दुनिया में और विभाजन बढ़ेगा।
आर्थिक कारण भी पीछे हैं। सऊदी अरब की विजन 2030 योजना के तहत अर्थव्यवस्था को तेल के आगे ले जाना है। लंबा युद्ध पर्यटन, निवेश और तेल निर्यात को नुकसान पहुंचाएगा। हूती हमले पहले ही लाल सागर के शिपिंग रूट को प्रभावित कर चुके हैं। बड़े संघर्ष से ये रूट और बिगड़ सकते हैं, जिससे global अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
सैन्य विकल्प भी सरल नहीं हैं। यमन का भूगोल पहाड़ी और जटिल है। 2015 से 2022 तक सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हवाई हमले किए, लेकिन जमीनी नियंत्रण हासिल नहीं कर सके। हूती लड़ाके गुरिल्ला युद्ध में माहिर हैं। पूर्ण आक्रमण में हजारों सैनिकों की जान जा सकती है और अरबों डॉलर खर्च हो सकते हैं। साथ ही सऊदी की छवि भी दांव पर लगेगी।
इसके बावजूद सऊदी सीमित सैन्य कार्रवाई और कूटनीति का मिश्र अपना रहा है। इजरायल के साथ संबंध normalizing करना ईरान विरोधी मोर्चा मजबूत करता है, लेकिन खुला युद्ध नहीं करता। विशेषज्ञों के मुताबिक, सऊदी की नीति निरोधक शक्ति पर आधारित है। वह हूतियों को इतना कमजोर रखना चाहता है कि बड़े हमले न कर सकें, लेकिन इतना मजबूत भी न छोड़े कि वे पूरी तरह खत्म हो जाएं और ईरान सीधे मैदान में उतरे।
अमेरिका का अनिश्चित समर्थन भी एक Factor है। वाशिंगटन की नीतियां बदलती रहती हैं। 2026 के परिदृश्य में अमेरिका यमन जैसे लंबे संघर्ष में नहीं फंसना चाहता। इसलिए रियाद जानता है कि पूर्ण आक्रमण पर वॉशिंगटन पूरा सैन्य समर्थन नहीं दे पाएगा। यही वजह है कि सऊदी सीमित जवाबी कार्रवाई करना पसंद करता है।
अंत में, सऊदी की यह संयम की नीति क्षेत्र को बड़े युद्ध से तो बचा ही रही है, साथ ही उसकी क्षेत्रीय शक्ति को भी मजबूत कर रही है। हूती हमले जारी रह सकते हैं, लेकिन पूरी तरह से संघर्ष में फंसने का जोखिम नहीं उठाया जा रहा। लंबे समय में यही दूरदर्शिता सऊदी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
