दलीप ट्रॉफी फाइनल: पहली पारी की बढ़त पर ट्रॉफी, बीसीसीआई को सवाल उठने पर बदलना ही पड़ेगा नियम
चेन्नई में दलीप ट्रॉफी फाइनल खत्म हुआ तो ईस्ट जोन के खिलाड़ी जश्न मना रहे थे. लेकिन क्रिकेट की दृष्टि से मुकाबला एक बड़ा सवाल छोड़ गया.
पांच दिन के फाइनल में ट्रॉफी का फैसला अखिरी दिन नहीं, बल्कि पहली पारी में ही लगभग तय हो गया. ईस्ट जोन ने 708 रन बनाकर दक्षिण जोन को 366 रन पर समेटा. इसके बाद खिताब उनकी मुट्ठी में आ गया.
ईशान किशन ने 334 गेंदों पर 270 रनों की मैराथन पारी खेली. ईस्ट जोन ने लंबे इंतजार के बाद दलीप ट्रॉफी जीती. इससे पहले टीम ने 2012-13 में खिताब जीता था.
असली सवाल यह रहा कि क्या ईस्ट जोन को जोखिम लेकर जीतने की जरूरत थी. जबकि पहली पारी की बढ़त ही ट्रॉफी की सुरक्षा कर रही थी, तो कप्तान को फॉलोऑन करवाने का कोई मजबूरी नहीं. ईशान ने हंसते हुए कहा था कि दो दिन बल्लेबाजी के बाद फॉलोऑन की जरूरत कहीं.
यही दलीप ट्रॉफी के पुराने नियम की विडंबना है. नॉकआउट मुकाबला दूसरी पारी पूरी होने से पहले खत्म होने पर पहली पारी की बढ़त के आधार पर तय होता है. बढ़त मिलते ही टीम के पास ट्रॉफी जीतने का सबसे बड़ा हथियार आ जाता है.
पिच ने भी कहर नहीं मारा. चेन्नई की लाल मिट्टी वाली सतह ने बल्लेबाजों को काफी सहूलियत दी. पांच दिनों में सतह में बहुत बदलाव नहीं आया. ईस्ट जोन के कोच रतन कुमार ने भी पिच की गुंजाइश की तारीफ की.
दक्षिण जोन की टीम में कुछ अनुभवी खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी ने भी सवाल खड़े किए. करुण नायर और आर साई किशोर फाइनल में नहीं थे. एक बड़ा फाइनल तब दिलचस्प बनता है जब दोनों टीमें अपने सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ मैदान में उतरें.
अंत में यह सवाल बना रहा कि अगर पहली पारी में बढ़त बनाते ही ट्रॉफी पक्की हो जाती है, तो आखिरी दिन कप्तान कितना जोखिम लेगा. बीसीसीआई को इस Old Rule पर फिर से सोचना होगा. फाइनल में जीत की भूख चाहिए, सिर्फ पहली पारी की बढ़त बचाने की मजबूरी नहीं.
