आज की बहारों में एक बड़ी सीमा वार्ता के बीच बदलती इतिहास के पन्नों को खोलने की कोशिश की जा रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ की गई 25वें दौर की स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया। यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब सेमिंगे खल्लाफत अमेरिका-चीन और रूस के बीच टकराव को और गहरा कर दे रही है।
वार्ता में दोनों देशों ने सीमा तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और रिश्तों में सकारात्मक रफ्तार जारी रखने पर सहमति व्यक्त की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले साल हुई मुलाकातों के बाद इस बातचीत को प्रोत्साहन दिया था। लेकिन इसे सिर्फ एक मोटिवेशनल सत्र कहना जरूरी नहीं है क्योंकि यह ब्रिक्स सम्मेलन के आगे एक महत्वपूर्ण कदम है।
ईरान युद्ध के बीच ट्रंप की नीति मानों ने वैश्विक व्यापार के सिंयमर को बदल दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप के सुरक्षा रणनीति को पुनः स्थापित कर दिया है। इस बदलाव के बीच भारत और चीन ने एक साथ नयी रणनीति के पन्ने खोलने की कोशिश की है।
गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच कई मुद्दों पर अविश्वास बना था। लेकिन अब सेना के पीछे हटने के बाद बड़े स्तर की बातचीत फिर शुरू हुई है। लगभग 3,800 किलोमीटर की विवादित सीमा का राजनीतिक हल निकालने की बातचीत जारी रखी है।
वांग यी ने भी इस बातचीत को एक वैश्विक रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया। भारत-चीन रिश्ते अब सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इनका वैश्विक महत्व है। उन्होंने भरोसा बढ़ाने और आपसी दिक्कतें दूर करने पर जोर दिया।
वार्ता के दौरान डोभाल ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के राज्यपाल रूट से सीमा व्यापार को बेहतर संबंधों की मिसाल बतायी। इसके साथ ही चीन के विदेश मंत्रालय ने सीमा प्रबंधन को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग को बढ़ाने पर गहराई से चर्चा की।
इस बातचीत का मतलब सिर्फ दोस्ती नहीं है, बल्कि आपसी टकराव को संभालकर रखने की कोशिश है। चीन ने भी इस बातचीत को एक गहरी और खुले मन वाली बात कही। नई सहमति बनने की उम्मीद जताई गई है।
भारत की रणनीति रूस या चीन के साथ किसी अमेरिका विरोधी गठबंधन में शामिल होना नहीं है। भारत की कोशिश है कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर हुए बिना अपने पास कई विकल्प खुले रखे।
अगले महीनों में दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग और पूतिन के साथ मुलाकात की संभावना है। यह एक ही मंच पर भारत, चीन और रूस के बीच नयी एकता के संकेत दे सकती है।
डोभाल की बीजिंग यात्रा का यही बड़ा संदेश है कि भारत और चीन अपने मतभेद खत्म नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें संभालकर रखने की कोशिश कर रहे हैं।
