राहुल शर्मा
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ագիրը

पिछले 20 जुलाई को दिल्ली में ‘स כמוरीतҳәара ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान परिपक्व हुआ संघर्ष पुलिस और छात्रों के बीच, जिसमें घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने अपनी दु:खभरी कहानी सामने रखी।

संसद भवन के बाहर जंतर-मंतर पर पुलिस ने भीड़ से शांत रहने की अपील की, फिर भी बोतलें, पत्थर और चप्पलें उन्हें फेंकी गईं। फँसे हुए पुलिसकर्मियों के पीछे जिनका परिवार है, उसके विषय में और भी बात उठी।

व्यक्ति-व्यक्ति के बयान से पता चलता है कि 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। 110 से अधिक बैरिकेड, 300 बॉडी प्रोटेक्टर और 20 लाउडहेलर समेत कई सुरक्षा उपकरणों को भी नुकसान पहुँचा। सरकारी व निजी वाहनों पर भी तोड़फोड़ हुई।

ऐसी ही एक घटना में मरीन कमांडो रह चुके पिता, अब सब-इCertफ़ कप प्रहरी के रूप में जाने जाने वाले अंकुश पाण्डी की कथा खास थी। कुंजल, उनकी बेटी, सोशल मीडिया पर देखी तस्वीरों में पिता के खून से सनी वर्दी को देखकर कहा कि उन्हें अपराधी समझा जाता है जबकि पुलिस पर हुए हमले को कम दिखाई गया।

सीभीआर एमएसआई की पत्नी सीमा ने भी הש चर्चा की कि उनके पति 33 साल पहले दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के तौर पर भर्ती हुए थे। भीड़ ने उनके पति पर पत्थर और गमले फेंके, जिससे उन्हें siga नी संप खाते। वह चहे 11 बजे घर लौटे, तभी पता चला कि उनकाUAGE हेलमेट टूटा हुआ था।

एसीपी की पत्नी, उपनित कौर, ने अपने पति के घायल होकर लौटने की रात को याद करते हुए बताया कि यह उनके लिए और उनकी दो साल की बेटी के लिए कितना डरावना था। उन्होंने ज़ोर दिया कि पुलिस पर कथित ‘ज्यादती’ के बारे में बात होती है, पर घायल अधिकारियों और परिवारों की पीड़ा पर चर्चा कम होती है।

पुलिस के परिजन भी यही मांग रखते हैं कि संसद में ‘संसद चलो’ आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को दोनों पक्षों के नज़रिए से समझा जाए। वे कहते हैं कि अगर छात्रों की चोटों और कहानियों पर चर्चा हो सकती है, तो पुलिस और उनके परिवारों की तक़लीफ़ को भी बराबर महत्व दिया जाना चाहिए।

इस सब के बीच, कुंजल ने कहा कि सोशल मीडिया पर उनके पिता को पहले ही अपराधी के रूप में दिखाया गया था। यह स्पष्ट करता है कि जनता के बीच आवाज़ें अक्सर एकतरफा हो जाती हैं। वह जोड़ती हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर चर्चा करेगा, तो हम एक सामान्य नागरिक के रूप में न्याय मांगने का अधिकार रखते हैं।

उसी तरह, एसीपी के बेटे लक्ष्मी सिंह ने भी बताया कि जब उन्होंने अपने पिता को अस्पताल में टांके और कटे हुए बालों के साथ देखा, तो वह पूरी तरह से हृदयविदारक था। उन्होंने कहा कि बहुत सारे छात्रों का दावा है कि पुलिस पर अत्याचार हुआ, पर वही स्थिति पुलिस के परिवार के लिए भी वैसी ही कठोर रही।

इन व्यक्तियों ने ऊपर उठते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद में केवल ‘मुकदमेबाज़ी’ या ‘ თूलवाप्सों पर ‘جھولا’ नहीं, बल्कि वास्तविक टांकन और राहत के लिए एक वास्तविक मंच की ज़रूरत है। वे चाहते हैं कि ‘संसद चलो’ के बाद हुए घटना के दोनों पक्षोंteile एक ही गंभीरता से सुने जाएँ।

इस प्रकार के बयान दर्शाते हैं कि परिजन किस हद तक अपने दुःख को साक्षात्कार करना चाहते हैं और पुलिस के परदे पीछे के मानव पक्ष को समझाना चाहते हैं। यही आज की सामाजिक जमानत को कल की नीतियों में अनसुना नहीं होना चाहिए।

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